और उस दिन गाँव के लोग, मिटटी, फूल, तालाब, खाली ज़मीन, खाली वक़्त, सब बहुत याद आ गया था। एक झटके से लगी चोट की तरह झटके से आयी याद भी, कई रग झन्ना देती है।
एक तरह से रोज़मर्रा की बात थी, हॉस्पीटल की गंदी हरी छत की शक्ल में उलटी लटकी दीवार के नीचे सैंकड़ों की भीड़ में रोज़ खड़े हो जाना। खून देने के लिए। एक नकारात्मकता की पराकाष्ठा का वीभत्स दृश्य। सबसे महानतम कृत्य भी, अपने सड़े हुए उद्देश्य के साथ, एक निकृष्ट पाप से अलग कुछ नहीं रहता।
एक बेनाम सा, मज़दूर की शक्ल और इंसानी ढाँचे में खड़ा, लाचारी का सर्टिफिकेट सा वो आदमी हर हफ्ते उस लाइन में लगता था। चेहरे पे सपाट अन्धकार, और साँसों में इको करती हुयी एक ट्रैन की आवाज़ जो सिर्फ चिर-यात्रा पे चलती हो। उम्र तकरीबन 27-28 बरस और पोटली में कुछ कीमती से चुराए हुए दिन जो उम्र के हाथ न आ पाये थे। खून देने से जो पैसे आयेंगे उनसे एक हफ्ते का राशन आएगा और उस से इतना खून बन जायेगा कि अगले हफ्ते फिर यहाँ आ जाया जाए। ज़िंदगी के किश्तों की एक vicious circle, जहाँ अपने आपको बेचा जा रहा है, अपने आप को ज़िंदगी की गिरवी से हर हफ्ते छुड़वाने के लिए।
और यादों का क्या था, बेहया औरतों की तरह एक बेसुध राहगीर को भटकाने आ गयी थीं। बेशरम, लाज रख, मैं तो अपनी उम्र की मियाद चुकाने आया हूँ, तू मुझे कहाँ गाँव की गलियों, फुर्सतों, मासूम अय्याशियों के खाबों में ले जाना चाहती है।
कतार आगे बढ़ने लगी थी, और वो यादों वाली बेशरम औरत जैसे दूर होती जा रही थी। एक वेदना और एक चेतना के बीच में एक तरफ वो बुत सा खड़ा और चारों तरफ से कुछ गूंजते हुए सरकासम। बस फिर सब ख़त्म होता जा रहा था, सिर्फ एक पहचानी औरत की आवाज़ ज़िद डाल के चीखती रही -
"बेटा , शहर मत जा ना, मैं कभी गयी नहीं मगर सुना है, बड़ा भयानक होता है ये, कहते हैं रोज़-रोज़ करके सारा खून चूस लेता हैं।"
कहीं न कहीं, अक्सर अपने आप को उसी इंसान के पीछे उसी लाइन में खड़ा सा पता हूँ।
एक तरह से रोज़मर्रा की बात थी, हॉस्पीटल की गंदी हरी छत की शक्ल में उलटी लटकी दीवार के नीचे सैंकड़ों की भीड़ में रोज़ खड़े हो जाना। खून देने के लिए। एक नकारात्मकता की पराकाष्ठा का वीभत्स दृश्य। सबसे महानतम कृत्य भी, अपने सड़े हुए उद्देश्य के साथ, एक निकृष्ट पाप से अलग कुछ नहीं रहता।
एक बेनाम सा, मज़दूर की शक्ल और इंसानी ढाँचे में खड़ा, लाचारी का सर्टिफिकेट सा वो आदमी हर हफ्ते उस लाइन में लगता था। चेहरे पे सपाट अन्धकार, और साँसों में इको करती हुयी एक ट्रैन की आवाज़ जो सिर्फ चिर-यात्रा पे चलती हो। उम्र तकरीबन 27-28 बरस और पोटली में कुछ कीमती से चुराए हुए दिन जो उम्र के हाथ न आ पाये थे। खून देने से जो पैसे आयेंगे उनसे एक हफ्ते का राशन आएगा और उस से इतना खून बन जायेगा कि अगले हफ्ते फिर यहाँ आ जाया जाए। ज़िंदगी के किश्तों की एक vicious circle, जहाँ अपने आपको बेचा जा रहा है, अपने आप को ज़िंदगी की गिरवी से हर हफ्ते छुड़वाने के लिए।
और यादों का क्या था, बेहया औरतों की तरह एक बेसुध राहगीर को भटकाने आ गयी थीं। बेशरम, लाज रख, मैं तो अपनी उम्र की मियाद चुकाने आया हूँ, तू मुझे कहाँ गाँव की गलियों, फुर्सतों, मासूम अय्याशियों के खाबों में ले जाना चाहती है।
कतार आगे बढ़ने लगी थी, और वो यादों वाली बेशरम औरत जैसे दूर होती जा रही थी। एक वेदना और एक चेतना के बीच में एक तरफ वो बुत सा खड़ा और चारों तरफ से कुछ गूंजते हुए सरकासम। बस फिर सब ख़त्म होता जा रहा था, सिर्फ एक पहचानी औरत की आवाज़ ज़िद डाल के चीखती रही -
"बेटा , शहर मत जा ना, मैं कभी गयी नहीं मगर सुना है, बड़ा भयानक होता है ये, कहते हैं रोज़-रोज़ करके सारा खून चूस लेता हैं।"
कहीं न कहीं, अक्सर अपने आप को उसी इंसान के पीछे उसी लाइन में खड़ा सा पता हूँ।
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