भूखा व्यक्ति भजन नहीं कर सकता !
और साथ ही प्रेम, घृणा, द्वेष, राग, जलन , या अन्य कुछ।
प्रेम में भूखा रहा जा सकता है, मगर भूख में प्रेम नहीं किया जा सकता।
समस्या हुयी की हम थे भूखे सो हम प्रेम नहीं कर सकते थे।
फिर भूख तो शांत हुयी नहीं, हाँ, प्रेम अवश्य एक काल्पनिक जातक कथाओं में पायी जाने वाली चीज़ हो गयी जिसका वर्णन हर मनुष्य के लिए अलग रहा।
हमने धीरे धीरे मान लिया की प्रेम वास्तव में होता नहीं कुछ, सिर्फ एक ख़ास तरह की भूख से ज्यादा।
जब प्रेम की काल्पनिकता को सामाजिक स्वीकृति मिल गयी तो हर काल्पनिक कैनवास पे ये छा गया।
हम मान गए की प्रेम को किसी मिसरे, किसी अफ़साने, किसी पेंटिंग या किसी मूवी में ही होना चाहिए, इसका जीवंत हो जाना ठीक नहीं है। हमारे हर लीजेंडरी शहकारों में प्रेम है, दुःख ये की वहां प्रेम दिखाने के लिए नहीं, समाज को "बचाने" के लिए रखा गया है। हमने माना, कि कृष्ण राधा से प्रेम करेंगे क्यूंकि ये विषय ही इश्वर जैसे परम शक्तिशाली के लिए हैं, मनुष्य जैसा तुच्छ प्राणी सिर्फ रोटी के बारे में सोचने को अभिशप्त है।
हमारे हर मूवीज में एक लड़का एक लड़की प्रेम करते हैं और अनावश्यक दिक्कतों का सामना कर एक दुसरे को पाते हैं।
लेकिन, तीन घंटे की बेहूदा नींद के बाद सिनेमा के जीने से उतरते हुए फिर वही सच - रात का खाना कैसे होगा। शायद घर पे लाइट भी न हो, और दिन वाले बर्तन भी तो साफ़ नहीं कर पाए थे।
वहीँ कहीं पर आज की ही तारीख में कुछ लोगों ने माना है क प्रेम इतना बड़ा विषय नहीं है क इसे कल्पना बना दिया जाए। वहां प्रेम जीवंत है। उनकी समस्या अलग है। उन्हें विश्व को बचाने की पड़ी है। एक महा-मानव आएगा और वही बचाएगा विश्व को उन समस्याओं से जो हैं ही नहीं, बल्कि बनायी गयी हैं, अविष्कार किया गया है उनका। ऐसे महा-मानव जो सिर्फ काल्पनिक ही हो सकते हैं - Spiderman , Superman , Ironman और पता नहीं क्या क्या।
उनके लिए प्रेम उतना ही सरल है जितना हमारे लिए दो वक़्त का खाना। हम कभी इस पर चर्चा नहीं करते , हम कभी ऐसी बाते सुन्ना तक पसंद नहीं करते जिसमे रोटी-दाल की फिक्र या जिक्र हो। क्युकी हम दिन-रात इसे झेल रहे हैं, इसके साथ खेल रहे हैं। और वो दिन-रात प्रेम को जी रहे हैं। एक ६० साल का हीरो एक २५ साल की हेरोइन से शादी करता है तो उसका ८५ साल का पिता इसलिए नाराज़ हो जाता है क्युकी वो खुद उस हेरोइन से शादी करना चाहता था। इतना सरल है प्रेम। ये अगर हमारे यहाँ की घटना होती तो शायद हम कहते की "ऐसा तो फिल्मो में भी नहीं होता" .
तो क्या सिर्फ इसलिए की उनका पेट भरा हुआ है, और रोटी की परेशानी से उबर चुके हैं, वो प्रेम को अनैतिकता की परिभाषा दे सकते हैं? जी नहीं, बिलकुल नहीं। लेकिन वो प्रयोग कर सकते हैं। क्यूंकि प्रयोग करने की शर्त है पेट का भरा होना।
हम प्रयोग नहीं कर सकते?
कर सकते हैं, और अपने पूर्वी नैतिकता की परिधि में रहते हुए प्रयोग कर सकते हैं, बशर्ते पेट भरा हो। अगर नहीं भरा है तो कम से कम रोटी की प्राथमिकता तो कम की ही जा सकती है।
वस्तुतः करना सिर्फ इतना है कि रोटी से हर चीज़ को नहीं जोड़ना है।
भूख हो तो रोटी मुक्ति का स्रोत है।
किन्तु, भूख को इतना महत्व न दें ये हम पर निर्भर है।
भूख का होना स्वाभाविक है, और उतना ही स्वाभाविक है भूख का मिट जाना भी।
इसके लिए आदर्शों, सिद्धांतों और स्वाभिमानों की बलि आवश्यक नहीं है।
भूख का निदान हो जायेगा मगर भूख की परिस्थिति में किये गए समझौते भारी पड़ जायेंगे।
आवश्यक है इस तथ्य को मान लेना कि भूख एक प्राकृतिक मांग है और इसको सैद्धांतिक समझौतों के ऊपर नहीं रखना है।
जब भूख की प्राथमिकता कम होगी तो हम समझ लेंगे की प्रेम वास्तव में काल्पनिक नहीं है।
और ये भी कि मुक्ति निवालों में नहीं, शिवालों में है।
और जब भूख प्राथमिक नहीं होगा तो प्रेम स्वयं प्राथमिक हो जायेगा।
प्रेम स्वाभाविक होगा तो हम गढ़ेंगे इसकी परिभाषाएं।
न कि पश्चिमी प्रदूषित "अ"सभ्यताएं।
और तब होगी मुक्ति, हमारी भी, और उस प्रेम की भी जो कल्पनाओं के कैनवास में क़ैद है, कुछ हज़ार बरसों से।
और साथ ही प्रेम, घृणा, द्वेष, राग, जलन , या अन्य कुछ।
प्रेम में भूखा रहा जा सकता है, मगर भूख में प्रेम नहीं किया जा सकता।
समस्या हुयी की हम थे भूखे सो हम प्रेम नहीं कर सकते थे।
फिर भूख तो शांत हुयी नहीं, हाँ, प्रेम अवश्य एक काल्पनिक जातक कथाओं में पायी जाने वाली चीज़ हो गयी जिसका वर्णन हर मनुष्य के लिए अलग रहा।
हमने धीरे धीरे मान लिया की प्रेम वास्तव में होता नहीं कुछ, सिर्फ एक ख़ास तरह की भूख से ज्यादा।
जब प्रेम की काल्पनिकता को सामाजिक स्वीकृति मिल गयी तो हर काल्पनिक कैनवास पे ये छा गया।
हम मान गए की प्रेम को किसी मिसरे, किसी अफ़साने, किसी पेंटिंग या किसी मूवी में ही होना चाहिए, इसका जीवंत हो जाना ठीक नहीं है। हमारे हर लीजेंडरी शहकारों में प्रेम है, दुःख ये की वहां प्रेम दिखाने के लिए नहीं, समाज को "बचाने" के लिए रखा गया है। हमने माना, कि कृष्ण राधा से प्रेम करेंगे क्यूंकि ये विषय ही इश्वर जैसे परम शक्तिशाली के लिए हैं, मनुष्य जैसा तुच्छ प्राणी सिर्फ रोटी के बारे में सोचने को अभिशप्त है।
हमारे हर मूवीज में एक लड़का एक लड़की प्रेम करते हैं और अनावश्यक दिक्कतों का सामना कर एक दुसरे को पाते हैं।
लेकिन, तीन घंटे की बेहूदा नींद के बाद सिनेमा के जीने से उतरते हुए फिर वही सच - रात का खाना कैसे होगा। शायद घर पे लाइट भी न हो, और दिन वाले बर्तन भी तो साफ़ नहीं कर पाए थे।
वहीँ कहीं पर आज की ही तारीख में कुछ लोगों ने माना है क प्रेम इतना बड़ा विषय नहीं है क इसे कल्पना बना दिया जाए। वहां प्रेम जीवंत है। उनकी समस्या अलग है। उन्हें विश्व को बचाने की पड़ी है। एक महा-मानव आएगा और वही बचाएगा विश्व को उन समस्याओं से जो हैं ही नहीं, बल्कि बनायी गयी हैं, अविष्कार किया गया है उनका। ऐसे महा-मानव जो सिर्फ काल्पनिक ही हो सकते हैं - Spiderman , Superman , Ironman और पता नहीं क्या क्या।
उनके लिए प्रेम उतना ही सरल है जितना हमारे लिए दो वक़्त का खाना। हम कभी इस पर चर्चा नहीं करते , हम कभी ऐसी बाते सुन्ना तक पसंद नहीं करते जिसमे रोटी-दाल की फिक्र या जिक्र हो। क्युकी हम दिन-रात इसे झेल रहे हैं, इसके साथ खेल रहे हैं। और वो दिन-रात प्रेम को जी रहे हैं। एक ६० साल का हीरो एक २५ साल की हेरोइन से शादी करता है तो उसका ८५ साल का पिता इसलिए नाराज़ हो जाता है क्युकी वो खुद उस हेरोइन से शादी करना चाहता था। इतना सरल है प्रेम। ये अगर हमारे यहाँ की घटना होती तो शायद हम कहते की "ऐसा तो फिल्मो में भी नहीं होता" .
तो क्या सिर्फ इसलिए की उनका पेट भरा हुआ है, और रोटी की परेशानी से उबर चुके हैं, वो प्रेम को अनैतिकता की परिभाषा दे सकते हैं? जी नहीं, बिलकुल नहीं। लेकिन वो प्रयोग कर सकते हैं। क्यूंकि प्रयोग करने की शर्त है पेट का भरा होना।
हम प्रयोग नहीं कर सकते?
कर सकते हैं, और अपने पूर्वी नैतिकता की परिधि में रहते हुए प्रयोग कर सकते हैं, बशर्ते पेट भरा हो। अगर नहीं भरा है तो कम से कम रोटी की प्राथमिकता तो कम की ही जा सकती है।
वस्तुतः करना सिर्फ इतना है कि रोटी से हर चीज़ को नहीं जोड़ना है।
भूख हो तो रोटी मुक्ति का स्रोत है।
किन्तु, भूख को इतना महत्व न दें ये हम पर निर्भर है।
भूख का होना स्वाभाविक है, और उतना ही स्वाभाविक है भूख का मिट जाना भी।
इसके लिए आदर्शों, सिद्धांतों और स्वाभिमानों की बलि आवश्यक नहीं है।
भूख का निदान हो जायेगा मगर भूख की परिस्थिति में किये गए समझौते भारी पड़ जायेंगे।
आवश्यक है इस तथ्य को मान लेना कि भूख एक प्राकृतिक मांग है और इसको सैद्धांतिक समझौतों के ऊपर नहीं रखना है।
जब भूख की प्राथमिकता कम होगी तो हम समझ लेंगे की प्रेम वास्तव में काल्पनिक नहीं है।
और ये भी कि मुक्ति निवालों में नहीं, शिवालों में है।
और जब भूख प्राथमिक नहीं होगा तो प्रेम स्वयं प्राथमिक हो जायेगा।
प्रेम स्वाभाविक होगा तो हम गढ़ेंगे इसकी परिभाषाएं।
न कि पश्चिमी प्रदूषित "अ"सभ्यताएं।
और तब होगी मुक्ति, हमारी भी, और उस प्रेम की भी जो कल्पनाओं के कैनवास में क़ैद है, कुछ हज़ार बरसों से।
जिस भाषा में शुरुआत हुई उसी में अंत नहीं हुआ फिर भी अच्छा है। लताड़ तो मस्त लगाई है।
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