Wednesday, December 4, 2013

शहर

और उस दिन गाँव के लोग, मिटटी, फूल, तालाब, खाली ज़मीन, खाली वक़्त, सब बहुत याद आ गया था। एक झटके से लगी चोट की तरह झटके से आयी याद भी, कई रग झन्ना देती है।

एक तरह से रोज़मर्रा की बात थी, हॉस्पीटल की गंदी हरी छत की शक्ल में उलटी लटकी दीवार के नीचे सैंकड़ों की भीड़ में रोज़ खड़े हो जाना। खून देने के लिए। एक नकारात्मकता की पराकाष्ठा का वीभत्स दृश्य। सबसे महानतम कृत्य भी, अपने सड़े हुए उद्देश्य के साथ, एक निकृष्ट पाप से अलग कुछ नहीं रहता।

एक बेनाम सा, मज़दूर की शक्ल और इंसानी ढाँचे में खड़ा, लाचारी का सर्टिफिकेट सा वो आदमी हर हफ्ते उस लाइन में लगता था। चेहरे पे सपाट अन्धकार, और साँसों में इको करती हुयी एक ट्रैन की आवाज़ जो सिर्फ चिर-यात्रा पे चलती हो। उम्र तकरीबन 27-28 बरस और पोटली में कुछ कीमती से चुराए हुए दिन जो उम्र के हाथ न आ पाये थे। खून देने से जो पैसे आयेंगे उनसे एक हफ्ते का राशन आएगा और उस से इतना खून बन जायेगा कि अगले हफ्ते फिर यहाँ आ जाया जाए। ज़िंदगी के किश्तों की एक vicious circle, जहाँ अपने आपको बेचा जा रहा है, अपने आप को ज़िंदगी की गिरवी से हर हफ्ते छुड़वाने के लिए।

और यादों का क्या था, बेहया औरतों की तरह एक बेसुध राहगीर को भटकाने आ गयी थीं। बेशरम, लाज रख, मैं तो अपनी उम्र की मियाद चुकाने आया हूँ, तू मुझे कहाँ गाँव की गलियों, फुर्सतों, मासूम अय्याशियों के खाबों में ले जाना चाहती है।

कतार आगे बढ़ने लगी थी, और वो यादों वाली बेशरम औरत जैसे दूर होती जा रही थी। एक वेदना और एक चेतना के बीच में एक तरफ वो बुत सा खड़ा और चारों तरफ से कुछ गूंजते हुए सरकासम। बस फिर सब ख़त्म होता जा रहा था, सिर्फ एक पहचानी औरत की आवाज़ ज़िद डाल के चीखती रही - 
"बेटा , शहर मत जा ना, मैं कभी गयी नहीं मगर सुना है, बड़ा भयानक होता है ये, कहते हैं रोज़-रोज़ करके सारा खून चूस लेता हैं।"

कहीं न कहीं, अक्सर अपने आप को उसी इंसान के पीछे उसी लाइन में खड़ा सा पता हूँ।

Saturday, September 14, 2013

भूख, प्रेम और मुक्ति

भूखा व्यक्ति भजन नहीं कर सकता !
और साथ ही प्रेम, घृणा, द्वेष, राग, जलन , या अन्य कुछ।

प्रेम में भूखा रहा जा सकता है, मगर भूख में प्रेम नहीं किया जा सकता।

समस्या हुयी की हम थे भूखे सो हम प्रेम नहीं कर सकते थे।
फिर भूख तो शांत हुयी नहीं, हाँ, प्रेम अवश्य एक काल्पनिक जातक कथाओं में पायी जाने वाली चीज़ हो गयी जिसका वर्णन हर मनुष्य के लिए अलग रहा।

हमने धीरे धीरे मान लिया की प्रेम वास्तव में होता नहीं कुछ, सिर्फ एक ख़ास तरह की भूख से ज्यादा।
जब प्रेम की  काल्पनिकता को सामाजिक स्वीकृति मिल गयी तो हर काल्पनिक कैनवास पे ये छा गया।

हम मान गए की प्रेम को  किसी मिसरे, किसी अफ़साने, किसी पेंटिंग या किसी मूवी में ही होना चाहिए, इसका जीवंत हो जाना ठीक नहीं है। हमारे हर लीजेंडरी शहकारों में प्रेम है, दुःख ये की वहां प्रेम दिखाने के लिए नहीं, समाज को "बचाने" के लिए रखा गया है। हमने माना, कि कृष्ण राधा से प्रेम करेंगे क्यूंकि ये विषय ही इश्वर जैसे परम शक्तिशाली के लिए हैं, मनुष्य जैसा तुच्छ प्राणी सिर्फ रोटी के बारे में सोचने को अभिशप्त है।

हमारे हर मूवीज में एक लड़का एक लड़की प्रेम करते हैं और अनावश्यक दिक्कतों का सामना कर एक दुसरे को पाते हैं।
लेकिन, तीन घंटे की बेहूदा नींद के बाद सिनेमा के जीने से उतरते हुए फिर वही सच - रात का खाना कैसे होगा। शायद घर पे लाइट भी न हो, और दिन वाले बर्तन भी तो साफ़ नहीं कर पाए थे।

वहीँ कहीं पर आज की ही तारीख में कुछ लोगों ने माना है क प्रेम इतना बड़ा विषय नहीं है क इसे कल्पना बना दिया जाए। वहां प्रेम जीवंत है। उनकी समस्या अलग है।  उन्हें विश्व को बचाने की पड़ी है। एक महा-मानव आएगा और वही बचाएगा विश्व को उन समस्याओं से जो हैं ही नहीं, बल्कि बनायी गयी हैं, अविष्कार किया गया है उनका। ऐसे महा-मानव जो सिर्फ काल्पनिक ही हो सकते हैं - Spiderman , Superman , Ironman और पता नहीं क्या क्या।

उनके लिए प्रेम उतना ही सरल है जितना हमारे लिए दो वक़्त का खाना। हम कभी इस पर चर्चा नहीं करते , हम कभी ऐसी बाते सुन्ना तक पसंद नहीं करते जिसमे रोटी-दाल की फिक्र या जिक्र हो।  क्युकी हम दिन-रात इसे झेल रहे हैं, इसके साथ खेल रहे हैं। और वो दिन-रात प्रेम को जी रहे हैं। एक ६० साल का हीरो एक २५ साल की हेरोइन से शादी करता है तो उसका ८५ साल का पिता इसलिए नाराज़ हो जाता है क्युकी वो खुद उस हेरोइन से शादी करना चाहता था। इतना सरल है प्रेम। ये अगर हमारे यहाँ की घटना होती तो शायद हम कहते की "ऐसा तो फिल्मो में भी नहीं होता" .

तो क्या सिर्फ इसलिए की उनका पेट भरा हुआ है, और रोटी की परेशानी से उबर चुके हैं, वो प्रेम को अनैतिकता की परिभाषा दे सकते हैं? जी नहीं, बिलकुल नहीं।  लेकिन वो प्रयोग कर सकते हैं।  क्यूंकि प्रयोग करने की शर्त है पेट का भरा होना।

हम प्रयोग नहीं कर सकते?

कर सकते हैं, और अपने पूर्वी नैतिकता की परिधि में रहते हुए प्रयोग कर सकते हैं, बशर्ते पेट भरा हो।  अगर नहीं भरा है तो कम से कम रोटी की प्राथमिकता तो कम की ही जा सकती है।

वस्तुतः करना सिर्फ इतना है कि रोटी से हर चीज़ को नहीं जोड़ना है।

भूख हो तो रोटी मुक्ति का स्रोत है।

किन्तु, भूख को इतना महत्व न दें ये हम पर निर्भर है।
भूख का होना स्वाभाविक है, और उतना ही स्वाभाविक है भूख का  मिट जाना भी।
इसके लिए आदर्शों, सिद्धांतों और स्वाभिमानों की बलि आवश्यक नहीं है।

भूख का निदान हो जायेगा मगर भूख की परिस्थिति में किये गए समझौते भारी पड़  जायेंगे।
आवश्यक है इस तथ्य को मान लेना कि भूख एक प्राकृतिक मांग है और इसको सैद्धांतिक समझौतों के ऊपर नहीं रखना है।

 जब भूख की प्राथमिकता कम होगी तो हम समझ लेंगे की प्रेम वास्तव में काल्पनिक नहीं है।
और ये भी कि  मुक्ति निवालों में नहीं, शिवालों में है।

और जब भूख प्राथमिक नहीं होगा तो प्रेम स्वयं प्राथमिक हो जायेगा।
प्रेम स्वाभाविक होगा तो हम गढ़ेंगे इसकी परिभाषाएं।
न कि  पश्चिमी प्रदूषित "अ"सभ्यताएं।

और तब होगी मुक्ति, हमारी भी, और उस प्रेम की भी जो कल्पनाओं के कैनवास में क़ैद है, कुछ हज़ार बरसों से।






Tuesday, September 10, 2013

आरम्भ

दो सबसे ख़ास सवाल -

१. सबसे सस्ती चीज़ क्या है?
२. सबसे महँगी चीज़ क्या है?

(खास तौर से इस ख़ास दौर में जब हर चीज़ की खासियत उसके price tag पे छपी होती है. यहाँ मैं वैसी निर्मूल्य चीज़ों को नहीं शामिल कर रहा जो अमूल्य हैं - मसलन पानी आग या हवा. इन्हें नहीं शामिल करने की एक वज़ह ये भी है की मैं इश्वर को एकलौते supplier के रूप में सबसे अमीर नहीं बनाना चाहता. अगर उन्होंने जमाखोरी, सूदखोरी मेहेंगाई या ऐसी कोई भी बीमारी जो  economics की किताबों में पायी जाती हैं और Sensex के  Thermometer से मापी जाती हैं, को भेज दिया तो वहां human rights वाले भी कुछ कर न पाएंगे.)

खैर वापिस आते हैं उन सवालों पे -

सबसे सस्ती चीज़,  पूर्णतया निजी अनुभव से कह सकता हूँ, मुझे लगता है "सलाह" है.
ये आपको कभी भी कहीं भी किसी से भी, चाहे-अनचाहे मिलती रहती है. हाँ, अक्सर इसके नाम बदलते रहते हैं - कभी गुज़ारिश, कभी हुक्म, तो कभी कसम, कभी भी कुछ भी मगर मिलना तय है.

और सबसे महँगी चीज़ है - ध्यान (गौर)- अटेंशन .
आपने नयी टाई लगायी है मगर दुनिया में अभी भी सिर्फ २४ घंटे हैं और आपकी नयी टाई ने आपके करीबी कलीग की डेडलाइन तक एक्सटेंड करने में कोई सहयोग नहीं दिया. इस गलती की वज़ह से टाई हो गयी अन-नोटीसेबल और आपको लगेगा के पैसा वसूल नहीं हो पाया.
एक बड़ी कार उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना ज़रूरी है एक छोटी कार वाला पडोसी. उसके बिना कौन देखेगा (देख के जलेगा) आपकी बड़ी गाडी के बड़े बड़े features. अगर आपके पडोसी के पास पल्सर है तो आपकी आल्टो भी ऑडी और अगर उसके पास रोल्स रोयस है तो आपकी ऑडी भी आल्टो.

समस्या ??

हमें सबसे महँगी चीज़ चाहिए मगर सबसे सस्ती चीज़ नहीं.
आप मेरी टाई या मेरी कार को नोटिस करिए, appreciate करिए, हो सके तो जलन में आत्महत्या कर लीजिये.पर ये मत बताइए की मैंने टाई की knot सही बाँधी है या नहीं या मेरी टाई मेरी शर्ट से मैच कर रही है या नहीं या मेरी बड़ी कार को पार्किंग की प्रॉब्लम हो सकती है या मुझे छोटी कार ले लेनी चाहिए थी क्यूंकि मेरे बेहेन की शादी नहीं हुयी है , खर्च आ सकता है.

बस यही समस्या है, नाइटलाइफ़ चाहिए मगर सूरज की रौशनी में  ...

निदान !
फेसबुक.
जी, यहाँ हम हर मिनट अपने मन का लिखेंगे, फिर लोगों की प्रतिक्रियाएं देखेंगे.
अगर कोई 'ध्यान' दे रहा है तो खुश होंगे, 'सलाह' आई तो एक-आध F वर्ड यूज़ कर के अपडेट बदल लेंगे.

बस इसी पलायनवादी सोच से थोडा भटकते हुए, ब्लॉग जैसे मंच पे चिल्लाने की एक कोशिश.
एक आरम्भ